
Pakhandvad Ke Daldal Me Dalit
पाखंडवाद के दलदल में दलित केवल एक पुस्तक नहीं, बल्कि समाज की उस सच्चाई का आईना है, जिसे अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। डॉ. महेन्द्र सिंह "मनराय" ने इस कृति में दलित समाज की पीड़ा, संघर्ष और उनके साथ होने वाले अन्याय को बेहद संवेदनशील और प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया है। यह पुस्तक पाखंड, सामाजिक भेदभाव और झूठी परंपराओं के उस दलदल को उजागर करती है, जहाँ इंसानियत बार-बार हारती नजर आती है। लेखक ने दिखाया है कि कैसे कुछ लोग धर्म और समाज के नाम पर भेदभाव को बढ़ावा देते हैं, और कमजोर वर्गों को दबाने का काम करते हैं। कहानी के माध्यम से पाठक न केवल दलित समाज की वास्तविक स्थिति को समझ पाता है, बल्कि यह भी महसूस करता है कि बदलाव की जरूरत कितनी जरूरी है। यह पुस्तक सोचने पर मजबूर करती है, सवाल उठाती है और पाठक के भीतर जागरूकता पैदा करती है। सरल भाषा, सशक्त भावनाएं और गहरी सामाजिक समझ इस कृति को खास बनाती हैं। यह पुस्तक उन सभी पाठकों के लिए है जो समाज की सच्चाई को जानना चाहते हैं और बदलाव की दिशा में सोच रखते हैं। अगर आप एक ऐसी पुस्तक पढ़ना चाहते हैं जो आपके नजरिए को बदल दे और आपको समाज के छिपे हुए पहलुओं से रूबरू कराए, तो **पाखंडवाद के दलदल में दलित** आपके लिए एक बेहतरीन विकल्प है।.
Product Details
- Format: Paperback
- Book Size:5 x 8
- Total Pages:78 pages
- Language:Hindi
- ISBN:978-9364314022
- Paper Type:Perfect
- Publication Date:April 26 ,2026
Product Description
पाखंडवाद के दलदल में दलित केवल एक पुस्तक नहीं, बल्कि समाज की उस सच्चाई का आईना है, जिसे अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। डॉ. महेन्द्र सिंह "मनराय" ने इस कृति में दलित समाज की पीड़ा, संघर्ष और उनके साथ होने वाले अन्याय को बेहद संवेदनशील और प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया है। यह पुस्तक पाखंड, सामाजिक भेदभाव और झूठी परंपराओं के उस दलदल को उजागर करती है, जहाँ इंसानियत बार-बार हारती नजर आती है। लेखक ने दिखाया है कि कैसे कुछ लोग धर्म और समाज के नाम पर भेदभाव को बढ़ावा देते हैं, और कमजोर वर्गों को दबाने का काम करते हैं। कहानी के माध्यम से पाठक न केवल दलित समाज की वास्तविक स्थिति को समझ पाता है, बल्कि यह भी महसूस करता है कि बदलाव की जरूरत कितनी जरूरी है। यह पुस्तक सोचने पर मजबूर करती है, सवाल उठाती है और पाठक के भीतर जागरूकता पैदा करती है। सरल भाषा, सशक्त भावनाएं और गहरी सामाजिक समझ इस कृति को खास बनाती हैं। यह पुस्तक उन सभी पाठकों के लिए है जो समाज की सच्चाई को जानना चाहते हैं और बदलाव की दिशा में सोच रखते हैं। अगर आप एक ऐसी पुस्तक पढ़ना चाहते हैं जो आपके नजरिए को बदल दे और आपको समाज के छिपे हुए पहलुओं से रूबरू कराए, तो **पाखंडवाद के दलदल में दलित** आपके लिए एक बेहतरीन विकल्प है।.






